Friday, August 26, 2011

beautiful poem

जिसे देश से प्यार नहीं हैं

जीने का अधिकार नहीं हैं।

जीने को तो पशु भी जीते

अपना पेट भरा करते हैं

कुछ दिन इस दुनिया में रह कर

वे अन्तत: मरा करते हैं।

ऐसे जीवन और मरण को,

होता यह संसार नहीं है

जीने का अथिकार नहीं हैं।

मानव वह है स्वयं जिए जो

और दूसरों को जीने दे,

जीवन-रस जो खुद पीता वह

उसे दूसरों को पीने दे।

साथ नहीं दे जो औरों का

क्या वह जीवन भार नहीं है?

जीने का अधिकार नहीं हैं।

साँसें गिनने को आगे भी

साँसों का उपयोग करो कुछ

काम आ सके जो समाज के

तुम ऐसा उद्योग करो कुछ।

क्या उसको सरिता कह सकते

जिसम़ें बहती धार नहीं है ?
जीने का अधिकार नहीं हैं।












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